अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं मानव जीवन को प्रभावित करनेवाले धार्मिक संगठनों एवं धर्मगुरुओं के संपूर्ण विरोध के बावजूद चार्ल्स डारविन का सिद्धांत प्रकृति के गूढ़तम रहस्य के उद्घाटन के रूप में सर्वमान्य रूप से स्थापित हो चुका है। मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूँ जो उल्टे चलकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं। गैलेलियो, न्यूटन, आईस्टाईन के सिद्धांतों में संशोधन, परिवर्द्धन का मतलब उसका गलत होना नहीं है। वे हमेशा ही विज्ञान की सीढ़ियाँ और स्थायी प्रकाश स्तंभ की भाँति हैं जिनसे विज्ञान का पथ आलोकित हुआ है और हम आगे बढ़े हैं। आगे बढ़ चुकने पर पिछले रास्ते गलत कैसे हो सकते हैं?
भौतिकी की स्थापना के पूर्व चेतना की अवस्था हमारे इंद्रिय ग्राह्य तो नहीं ही हैं अभी तक बुद्धि ग्राह्य भी नहीं हैं; प्रमाण तो दूर है। अतः हम भौतिक परिस्थिति से यदि निरूपण करें तो पाएँगे कि विभिन्न 'भौतिक ऊर्जा' ने 'रसायन' को जन्म दिया एवं रसायन ने जीवन को। रसायन एवं जीवन के मिलन बिन्दु से आगे एककोशीय जीवन, बहुकोशीय, वनस्पति जीवन फिर प्राणी जगत का उद्गम हुआ।
नृविज्ञान के तथाकथित Data को छोड़कर हम तथ्यात्मक बिन्दुओं की ओर ध्यान दें:
1. प्राणी जगत की एक मुख्य विशेषता स्थान परिवर्त्तन (Locomotion) रही है। आज से कुछ समय पूर्व (लाखों वर्ष) इसके लिए कुछ प्राणी चार पैरों का इस्तेमाल करते थे। इन चौपायों में कुछ ने इस गतिशीलता के लिए सिर्फ दो पैरों के इस्तेमाल की बात सोची और विभिन्न स्वरूपों गोरिल्लों, चिंपाजी, बंदर इत्यादि सीढ़ियाँ पार करते हुए आधुनिक मानव (Homosapian) के रूप में विकसित हुए।
2. इस पृथ्वी पर आज मानव समूह विकसित, विकासशील एवं अविकसित समुदायों में विभक्त हो चुका है। आज एक विकसित एक अविकसित को उत्सुकता की दृष्टि से देखता है एवं उसकी सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए कुछ उसी भाव से आगे आ रहा है जिस भाव से हम विलुप्त हो रहे प्रजातियों यथा-बाघ, पंडा इत्यादि की सुरक्षा करना चाहते हैं।
3. पिछले कुछ हजार सालों में (जबसे मानव इतिहास की मुकम्मल जानकारी है) यदि विभिन्न मानव समुदाय में इतना अंतर आ गया है जबकि विकास दर धीमी मानी जा सकती है तो अगले दस हजार सालों में क्या होगा (जब विकास अत्यंत तेज एवं त्वरित गति से हो रहा है)? क्या मानव जाति पूरी तरह अलग
प्रजाति (या प्रजातियों) में विभक्त नहीं हो जाएगी? क्या कुछ लोग अतिमानव (Supersapian) नहीं हो जाएंगे; जबकि कुछ लोग मानव ही रह जाएँगे।
क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चे Homosapian रह जाएँ और कुछ दूसरे अति मानव हो जाएँ ? और जैसे सभी जीव आज की मानव जाति के लिए किसी न किसी रूप में खुराक हैं तो आपका Progeny भी Supersapian के लिए इसी रूप में शामिल हो जाए? नहीं! कदापि नहीं।
यही विचार तलाश के उद्गम का मुख्य कारण है। ये बातें मैंने तलाश (2002) की शुरूआती बैठकों में लोगों से कही। एक मेडिकल जर्नल के संपादक के रूप में भी सन् 2002 में ये बातें मैंने लिखी थी। अबतक आप सुनते रहे हैं और इसे गप मानकर हँसते हुए अपनी राह चलते रहे हैं क्योंकि यह विचार Made in India है।
परन्तु ध्यान दें- 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के दिनांक 27 अक्टूबर 2007 का प्रथम समाचार (एवं 'द हिन्दू' का भी प्रमुख समाचार) जिसमें लिखा है कि ब्रिटेन के कुछ वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि अगले एक लाख वर्ष में मानव जाति दो भिन्न प्रजातियों (एक बहुत बड़ा आनुवांशिक अंतर) में विभक्त हो जाएगा, जैसा कि ऊपर निरूपित किया जा चुका है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के मि० ओलिवर करी के अनुसार सिर्फ 1000 साल में मनुष्य 6 से 7 फीट लंबा एवं 120 वर्ष आयु वाला हो जाएगा (निश्चित रूप से सभी समुदाय ऐसा नहीं हो पाएँगे)। और सिर्फ 10,000 सालों में आनुवांशिक विज्ञान के हेर-फेर एवं तकनीकी विकास के चलते मानव जाति में अप्रत्याशित परिवर्तन हो जाएँगे।
अब तो ये बातें जो मैं कह रहा था या कह रहा हूँ वह Made in England हो गया। दुनिया के तमाम अखबारों में आ चुका है। अब तो विश्वास करेंगे! अब तो जागें! अब तो कोशिश शुरू करें कि हम Supersapian में शामिल हों न कि Homosapian रह जाएँ।
इसके लिए 'करना क्या है' से पहले हमें समझना होगा कि ऐसा होगा क्यों और कैसे? इसका मेकेनिज्म क्या होगा; इस बात का विश्लेषण जरूरी है, तभी हम निदान खोज पाएँगे और करना क्या है यह भी समझ पाएँगे। यह भी समझ पाएँगे कि 'तलाश' अभियान से इसका सीधा संबंध कैसे है।
हमें जानना होगा कि 'भौतिकी' से 'रसायन' एवं 'रसायन' से 'जीव' की यात्रा के बीच एवं जीवों के बीच वायरस, बैक्टिरिया, एककोशीय वनस्पति, Plankton एककोशीय प्राणी अमीबा एवं बहुकोशीय व्हेल, चेतन मनुष्य और मांसाहारी पौधों, विशालकाय वटवृक्षों के विकास यात्रा में समानता क्या है?
जीवन की जिजीविषा, इसके लिए उसकी आवश्यकता एवं उपलब्ध वातावरण (संसाधन) ही मुख्य बिन्दु है। विकास 'आवश्यकता' एवं 'उपलब्धता' पर आधारित है। इसीलिए इतनी भिन्नता है। यही नियामक है विकास का, परिवर्तन का।
4. चौपायों से दोपायों की यात्रा के बीच के कुछ लोग आज भी गुरिल्ले, चिपांजी या बंदर की अवस्था में कैसे रह गए? वे आजतक लगभग वैसे ही Progeny क्यों उत्पन्न करते रह गए, जबकि कुछ लोग इतने भिन्न हो गए?
'संतुष्टि'
क्योंकि विकास की आवश्यकता को वह महसूस नहीं कर पाए और उनका संतुष्ट अंतर्मन रुक गया वहीं (They stopped to feel that they should improve.)|
कैसे?
चाहत से आनुवांशिक परिवर्तन का क्या संबंध है। इसका क्या मेकेनिज्म है। हर कोई तो बेहतर होना चाहता ही है। मेरे पास प्रमाण नहीं है। उदाहरण है। उदाहरण के रूप में प्रमाण है।
किसी घटना को सुनकर हमें रोमांच हो जाता है। सुनना मानसिक प्रक्रिया है। रोंगटों का खड़ा हो जाना शारीरिक परिवर्तन। विपरीत सेक्स की कल्पना मात्र कई शारीरिक क्रियाएँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं। ऑर्गेज्म की अनुभूति शरीर के कण-कण की अनुभूति कैसे होती है। अत्यंत बुरी खबर से हृदय की धड़कन क्यों रुक सकती है? आँसू क्यों निकल सकते हैं?
निष्कर्ष- 'विचार' काफी असरदार ढंग से हमारी शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। बराबर करता रहता है। बेहतरी की इच्छा 'प्रगति' की पहली जरूरत है। दूसरा किस्सा लें। एक ही प्रजाति के दो समूहों में फर्क क्यों?
-एक ही प्रजाति का पौधा कोई ज्यादा लाल कोई फीका लाल फूल कैसे उत्पन्न करता है?
-एक ही प्रजाति की गाय ज्यादा दूध क्यों देती है?
-क्या एशियन एवं अफ्रीकी हाथी अलग-अलग ढंग से विकसित हुए?
-कोई ज्यादा लंबा, कोई मोटा, कोई काला कैसे हो गया? परिवर्तनों की फेहरिस्त अत्यंत लंबी हो सकती है। यदि भेड़ों, बकरियों, सूअरों आदि को शामिल करें।
लगातार या काफी समय के अन्तर से ये परिवर्तन आनुवांशिक हो गए और ऐसे कई आनुवांशिक परिवर्तन यदि महत्त्वपूर्ण हो गये तो प्रजाति बदल गई। यह 'चीजों' की उपलब्धता, बेहतर होने की इच्छा की सचेतन प्रक्रिया के द्वारा आनुवांशिक हो गए (हो जाते हैं)।
ये आनुवांशिक परिवर्तन शारीरिक कोषों में होकर शुक्राणुओं या डिम्ब में आ जाते हैं। इस प्रकार एक मानव के शुक्र/डिम्ब का पूर्ण Genetic Mapping यदि शुरू में 18 वर्ष एवं पुनः 60 वर्ष की अवस्था में की जाए तो कुछ लोगों में इसमें अत्यंत सूक्ष्म परिवर्तन लक्षित किया जाना चाहिए। आगे सिद्ध हो सकने वाले इस विषय पर मैं और ज्यादा प्रकाश नहीं डाल सकता।
इसलिए 'तलाश' चाहती है कि हमारे लोगों को बेहतर एवं पूरा भोजन, बेहतर कपड़े, बेहतर सड़कें, स्वस्थ वातावरण, उच्चतम शिक्षा के अवसर मिलें। लोगों में युगों से संतुष्ट रह जाने की मानसिकता को छोड़कर प्रगति की आंतरिक दुर्द्धर्ष भावना उत्पन्न हो ताकि उपलब्धता एवं बेहतरी की चेतन एवं अवचेतन आकांक्षा द्वारा उन आनुवांशिक गुणों में परिवर्त्तित हो जाए जो हमारे बच्चों को Supersapian के रूप में विकसित कर देंगे।
तो क्यों नहीं हम सबकुछ लुटाकर अपने बच्चों के लिए भविष्य सुरक्षित कर दें और उन्हें सबकुछ उपलब्ध करा दें।
हमारी वर्तमान सोच ने हमें स्वर्णयुग से आज की त्रासदपूर्ण सामाजिक परिस्थिति में ढकेल दिया है जहां हम दोयम दर्जे के लोग हो गए हैं। विकासशील हैं और विकासशील ही रह जाएँगे, यदि हमने समय रहते उपाय नहीं किया।
व्यक्ति और समाज के संबंधों की विवेचना का वक्त नहीं है। परन्तु समाज यदि जलस्तर है तो व्यक्ति उसकी तरंगों के समान। अतः जलस्तर ऊँचा करना सभी तरंगों की ऊँचाई बढ़ा देगा। निम्न जलस्तर में बहुत ऊँची तरंगे उत्पन्न ही नहीं हो सकतीं
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