महानिबंधक बिहार के अनुसार सिर्फ बिहार में करीब 20 हजार स्वयंसेवी संस्थाएँ हैं, जिनमें करीब 2 हजार कार्यरत हैं, एवं उनमें काफी संस्थाएँ अच्छा कार्य कर रही हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत में कितनी संस्थाएँ हुई?
ये तो संस्थाओं की बातें हैं। व्यक्तिगत स्तर पर हजारों नहीं शायद लाखों व्यक्ति ऐसे हैं जो स्वयं के अलावे 'पर' (दूसरों) के लिए कुछ-न-कुछ अच्छा कर रहे हैं।
ऐसी संस्थाएँ एवं लोग इतनी ज्यादा संख्या में युगों से कार्य कर रहे हैं। आज आप सब लोग यहाँ इकट्ठे हैं क्योंकि आप सब में कुछ बेहतर करने एवं होने की इच्छा है।
फिर भी अपेक्षित असर नहीं है। क्योंकि हम लोगों का स्वर अलग-अलग स्वर है।
अतः 'तलाश' की मूल अवधारणाओं में यह भी एक मूल बात है कि ऐसे सभी लोग, सभी संस्थाएँ मूलभूत तथ्य पर एक स्वर से आवाज दें तब यह आवाज इतनी बुलंद होगी कि बहरे बने लोग भी सुन लेंगे।
समूह अथवा संघ की ताकत सर्वोपरि है।
परिवर्तन के लिए समर्थ है।
परिवर्तन के लिए आवश्यक है। इसके बिना यथा-स्थिति बनी रहेगी।
तलाश में कुछ भी अधिकारिता नहीं है, कोई कापी राईट नहीं है, जहां से भी जो भी अच्छा लगता है हर कोई अपनी इच्छा के अनुसार अच्छा करने के लिए स्वतंत्र है, आमंत्रित है। कार्य होना चाहिए, बस।
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