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राजनीति जीवन का आवश्यक पहलू है।
राजनीति हमारे जीवन को हर दिन लगभग हर जगह प्रभावित करती है।
हर व्यक्ति राजनीति को प्रभावित करता रहता है फिर अराजनैतिक होना कैसे संभव है ?

सक्रिय राजनीति यथार्थ की तरह है इसका एक स्वरूप है एक पहचान है- एक प्रक्रिया है। राजनीति सोद्देश्य है। प्रथमतः सत्ता हासिल करना। सत्ता परिवर्तन, जनकल्याण का काफी सीधा एवं सबसे असरदार रास्ता भी है, परन्तु ऐसा हमेशा होता नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द का कार्य जन कल्याण का कार्य था, राष्ट्र निर्माण का कार्य था।

राम मोहन राय का कार्य सामाजिक उत्थान का कार्य था।
महात्मा गाँधी का कार्य सामाजिक उत्थान के लिए राजनीति का, शासन तंत्र के उपयोग का मार्ग था परन्तु स्वयं राजनीति से कोसों दूर थे।

राजनीति में विरोधाभास है, यह रेखाएँ खींचता है। समग्रता संभव नहीं है। प्रलोभन, मजबूरियाँ होती हैं। उद्देश्य भटक सकता है। अराजनीतिक प्रयास में उद्देश्य स्थिर होता है।
अहिंसा ?

पदाधिकारी महोदय आप कार्यालय इतनी देर से क्यों आए ?
आप पूछने वाले कौन हैं?
मैं... आम जनता हूँ, प्रजातंत्र का राजा।
ऐ किशन (Peon)! इन्हें बाहर करो ये सरकारी कार्य में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

क्रोध, Physical Clash
कानूनी कार्यवाई।
थाना, कचहरी, परेशानी।

शक्ति का ह्रास, दोनों पक्षों का। और फल? कार्य का नहीं होना, अन्य कार्यों में भी बाधा, आगे कभी भी ऐसे झगड़े पचड़े में न पड़ने की कसम एवं सीख।

हिंसा में संघर्ष सन्निहित है।
संघर्ष में उभय शक्तियों का क्षय भी निश्चित है।
छूटे हुए बाण की तरह अस्त्र है।
न लौट सकता है न इसका पुनः उपयोग हो सकता है।
विजय किसी एक ही पक्ष की सम्भव है।
अहिंसा में अपनी ऊर्जा का भंडार विशाल होना आवश्यक है। परन्तु उसमें क्षय नहीं होता, संघर्ष नहीं होता।

दोनों पक्षों की विजय होती है।
अत्यंत प्रजातांत्रिक है- उच्चतम मानवीय मूल्यों पर आधारित है। एक शस्त्र की तरह हमेशा साथ है।

हम सुधरेंगे-जग सुधरेगा

  • बच्चे गुड़ मत खा। पहले स्वयं गुड़ खाना छोड़ उस संत या गाँधी की तरह जो कम होते हैं, बिरले होते हैं और कभी-कभी ही होते हैं।
  • इन्होंने परिवर्तन भी किया है।
  • क्या सर्वसाधारण या बहुत लोग उस संत की तरह हो पाएँगे?
  • इस परिवर्तन में कितना समय लगेगा?
  • क्या परिवर्तन पुनः उस संत के पैदा होने की प्रतीक्षा करता रहेगा?
  • क्या एक गरीब दूसरे गरीब को गरीब कहने का हक खो देता है?
  • क्या एक चोर दूसरे को चोर नहीं कह सकता?
  • क्या सभी (अधिकांश) कहीं न कहीं चोर नहीं हैं?
  • चोर-चोर मौसेरे भाई बनकर और बड़ा खोट नहीं पैदा कर रहे हैं?
  • तो ?

  • ठीक है हम भी कहीं गलत हैं, परन्तु आप यहाँ गलत हैं, यह न करिये।
  • पहले अपने गिरेबान में झाँकिये।
  • दूसरे की तरफ एक ऊँगली दिखाने पर तीन ऊँगलियाँ अपनी तरफ इंगित करती हैं।
  • (जरूर! मुझको भी सुधरना चाहिए)
  • ठीक है, मैं भी गलती करता हूँ इसका मतलब यह नहीं कि आप गलती करें, इसका प्रभाव मुझ पर पड़े और मैं चुप रहूँ। मैं तो कहूँगा भी और कुछ करूँगा भी।
  • मैं भी आपको देख लूँगा, मैं भी आपके विरुद्ध लगता हूँ।
  • मैं आपको रोक तो नहीं सकता, अवश्य करिये।
  • ठीक है।
  • (मुझे भी अपनी कमियाँ दूर करनी पड़ेगी)
  • हम सब कम-से-कम एक सीढ़ी ऊपर तो चढ़ सकेंगे।

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