खतरे में संस्कार पड़ा है,
बिखर रही हैं विकृतियाँ।
नये सरोवर में विकसा है,
नवल पद्म सी संस्कृतियाँ।
बुद्धि सदा भ्रमित हुई है,
नहीं भ्रमित होता है ज्ञान।
सतमनुजों समझो अपने को,
अपने फन को लो पहचान।
प्रकट हुआ नवनीत लिए जो,
ज्ञान समुन्दर को मथकर।
जड़ताओं से जूझ सका वह,
जहर पिया उन्नत सर कर।
रुका नहीं वो, झुका नहीं जो,
जग के लाख विरोधों पर।
सोच-सोच कर हार गया पर,
ठौर नहीं पाया गज भर
जीवन को जीना सिखलाया।
मौन मंत्र उच्चारण कर।
अपने को पहचान सकें हम,
ऐसा दीप जले हर घर।
श्रीमती शोभा सिंहा
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