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तलाश

एक रचनात्मक सामूहिक सोच

तलाश

एक रचनात्मक सामूहिक सोच



“हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी।।”




  • गलत को गलत कहें
  • अच्छे को अच्छा कहें
  • अपनी आमदनी वाजिब तरीके से प्रतिदिन बढ़ाएं
  • रचनात्मक सामूहिक सोच का निर्माण करें
  • सभी कार्य अराजनीतिक एवं अहिंसात्मक हों

तलाश के लक्ष्य एवं उद्देश्य

  1. एक अराजनैतिक, अहिंसात्मक, वैचारिक अभियान है।
  2. आमलोगों के जीवन स्तर में सुधार हेतु सामाजिक जीवन के सभी आयामों के कार्य-कलापों में सुधार लाने का कार्य करेगा।
  3. प्रत्येक नागरिक में 'सच को सच' एवं 'गलत को गलत' कहने की शक्ति पैदा करेगा।
  4. प्रत्येक नागरिक को वाजिब तरीके से प्रतिदिन अपनी आय में वृद्धि करने हेतु प्रोत्साहित करेगा।
  5. रचनात्मक सामूहिक सोच का निर्माण करने को कृतंसकल्प है।
  6. संबंधित सक्षम अधिकारियों/व्यक्तियों को सही दिशा में कार्य करने हेतु प्रेरित करेगा।
  7. किसी प्रकार की सीधी सेवा नहीं प्रदान करेगा।
  8. पूरे भारत में आम व्यक्ति को पहरुए की तरह जागरूक करने का काम करेगा। यह किसी भी क्षेत्र/प्रकार की गलती दिखने पर उसे अहिंसात्मक ढंग से ठीक करेगा।
  9. सदस्य बनने हेतु कोई शुल्क नहीं होगा एवं इसके सदस्य अवैतनिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करेंगे।
  10. इसका अपना कोई निधि कोष नहीं होगा। संस्था के छोट-मोटे खर्च सदस्यगण मिलकर वाहन करेंगे।
  11. इसका अन्य गैर सरकारी संगठन की तरह निबंधन नहीं होगा एवं इसमें कोई अध्यक्ष, सचिव अथवा कार्यकारिणी नहीं होगी।

कोष, कुर्सी, कौन! तीनों गौण!!

ये सूरत बदलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।।
आज यह दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी,
शर्त्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर शहर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

आप लोग

क्या कहूँ कि किस तरह सड़ गए हैं आप लोग,
सियासत के पचड़े में पड़ गए हैं आप लोग।
दलदल में हैं धँसे हुए, छींटों से खेलते हैं,
फिर भी दामन साफ है, कहते हैं आप लोग।
हमारे दिलों में कितनी गहराई, जज़्बातों की है,
नश्तर चुभा-चुभा के नापते हैं आप लोग।
सीमाएँ बेमानी हैं, मूल्यों के अर्थ बदल डाले,
शर्म-ओ-हया को बेचकर जीते हैं आप लोग।
अपनों से ही लड़-कट के बिखरता है आदमी,
मुहब्बत के नाम से ही खेलते हैं आप लोग।
जिनकी आँखें हैं खोजती सुबह की रौशनी,
उनकी लंबी रातों के नुमाइंदे हैं आप लोग।
वो जो रोज भीख चौराहे पे माँगता है,
लूटने में तो उसे भी, न बख्शे हैं आप लोग।

तलाश की बैठक एवं कार्यक्रम की समय सारणी

क्र. सं. तिथि स्थान कार्यसूची मुख्य अतिथि
1 2026-04-16
2 2026-04-15 patna galt g
3 2006-12-03 डा० बिन्देश्वर

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आमंत्रण

आप जहाँ भी हैं, जो कुछ भी अच्छा कर रहे हैं, करते चलें,

अन्य लोगों को भी अपनी सृजनात्मक ऊर्जा से उत्प्रेरित करते चलें,

‘तलाश’ तो आप के मन-प्राण में है।

वृहत् एवं त्वरित बदलाव के लिए आपका-हमारा जुड़ना आवश्यक है।

मिलें तो सही,

बातें तो हों,

हर माह के प्रथम रविवार की बैठक में शामिल हों।

— ‘तलाश’ परिवार

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