तलाश एक विचारधारा रूपी आंदोलन है जो घरातल पर ऐसे कार्य कर सके जिससे हमारा जीवन स्तर उच्चतर हो सके।
यह सब सिर्फ कार्य करने से ही संभव है, न कि केवल विचारों के आदान-प्रदान से। लेकिन हर कार्य के पहले
विचार उत्पन्न होना, वैचारिक दृढ़ता होना आवश्यक है। तभी कुछ भी क्रियान्वित हो सकता है।
आज के संदर्भ में ऐसा लगता है कि हमारे समाज में कार्य करने की एजेंसियाँ (Agencies), सरकारी या
गैर-सरकारी काफी हैं। परन्तु यथार्थ यही है कि आम आदमी बहुत परेशान है। इसका प्रमुख कारण, जो कार्य
करनेवाले हैं उनमें उत्तरदायित्व के अंत: बोध (Internal Policing) की कमी एवं उनसे काम करवाने का
बाह्य-दबाव (External Policing) दोनों का अभाव है। आंतरिक उत्तरदायित्व की भावना यह समझने से उत्पन्न हो सकती है कि सामूहिक हित का काम जो उनकी
व्यक्तिगत कठिनाई जैसा प्रतीत होता है; वस्तुतः उनके लिए या उनके "स्वयं" के लिए ही अत्यंत आवश्यक है।
सामूहिक हित की बलि पर स्वयं का धनार्जन करना, चाहे वह कोई भी हों इंजीनियर, चिकित्सक, प्रोफेसर,
वकील, व्यवसायी, उद्योगपति, अन्ततः उन्हें वह सब कुछ नहीं प्रदान कर सकता है जो सामूहिक जीवन स्तर
उठने से उन्हें मिल सकता था; जैसे अच्छी सड़कें, साफ मुहल्ले, रौशन गलियाँ, परवाह करनेवाले अधिकारी,
चिकित्सक, व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सम्मान।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आप कितने भी बड़े अधिकारी हों, यदि गलियाँ गंदी हैं;
तो मच्छर होंगे, और काटने से आपको या आपके परिवार को मलेरिया इत्यादि हो सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।
कार्य होने का दूसरा कारण बाह्य दबाव (External Policing) की व्यवस्था सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी तंत्रों में पहले से ही हैं,
फिर भी वह उपर्युक्त कारणों से ही अक्षम, निष्क्रिय है अथवा विपरीत दिशा में काम करती है।
अतः यह दबाव उस व्यक्ति को उत्पन्न करना पड़ेगा जो उसका उपभोक्ता (आम आदमी) है।
प्रजातांत्रिक व्यवस्था में वही मालिक है। अतः Policing का कार्य या दायित्व भी अन्ततः उसी का है।
इसके लिए उसकी भी समझ व्यक्तिपरक होने के साथ-साथ समाजपरक होनी आवश्यक है।
किसी भी कार्य-प्रणाली के कार्य करने में आम व्यक्ति ही वह तत्त्व हो सकता है जो अंततः सभी निकायों की
जंग या जकड़न छुड़ाकर फिर से उन्हें दिशाओं में चलायमान कर सकता है।
अतः हर ऐसे व्यक्ति का वैचारिक परिवर्तन एवं उसमें आवश्यक वैचारिक दृढ़ता उत्पन्न करना आवश्यक है।
विश्लेषण से ऐसा लगता है कि समाज, राज्य/देश, की दुर्दशा या अवांछनीय दुर्गति समर्थ लोगों/बुद्धिजीवी/अधिकार संपन्न के द्वारा ही स्वार्थ-पोषण के कारण हुई है।
परन्तु, यह भी सत्य प्रतीत होता है कि यही वह वर्ग है जो अच्छा परिवर्तन करने में सक्षम है।
सामाजिक गिरावट से इस वर्ग को व्यक्तिगत, सामाजिक परेशानी भी कहीं ज्यादा है।
अच्छी और सही दिशा में समाज के चलने से पुनः सबसे ज्यादा लाभ भी इसी को होगा।
अतः इस वर्ग का खास दायित्व है कि समाज का दिशा निर्देशन करने के लिए संकल्पबद्ध हो।
भारत जैसे अध्यात्म या धर्म प्रधान देश में जहाँ थोड़े से संतोष करना आर्ष-वाक्य के रूप में प्रचलित है,
वहाँ भौतिक उत्थान की बात करना, भौतिक रूप से जीवन स्तर बढ़ाने को कहना कहाँ तक उचित है?
यह बात आसानी से लोगों की समझ में नहीं आती है।
परन्तु वैज्ञानिक रूप से यदि विश्लेषण किया जाय तो यह समझ में आता है कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन का Survival of the fittest सिद्धांत निर्विवाद रूप से लागू होता रहा है; और यह शायद अंतिम प्राकृतिक सत्य है। यदि हमलोगों ने अपनी आर्थिक क्षमता, भौतिक क्षमता, तकनीकी क्षमता, पौष्टिक भोजन (Nutrition) और सार्वभौम सुरक्षा की अनवरत व्यवस्था नहीं की तो अगले कुछ ही सौ सालों में हम दूसरे स्तर के प्राणी रह जाएँगे और कुछ लोग जो ज्यादा सक्षम होंगे हमारे साथ वही व्यवहार करेंगे जो आज हम दूसरे स्तर के प्राणियों के साथ कर रहे हैं। यह वैज्ञानिक गल्प नहीं वरन् वैज्ञानिक हकीकत है। अतः सभी विचारवान देशवासियों को एकजुट होकर इस स्थिति से उबरना होगा।
राष्ट्रपति लिंकन से पूर्व एक मानव दूसरे मानव का गुलाम हुआ करता था। गुलामी का मोल एक गुलाम क्या चुकाता था? वह सब कुछ जो उसके पास था। अर्थात् बहुत ही कम मूल्य के लिए उसके हाथ/पैर/सारी शारीरिक शक्ति (उसका एकमात्र आर्थिक वजूद) का उपयोग उसके स्वामियों के लिए होता था। उसके कुछ समय बाद इस आर्थिक शोषण का स्वरूप बदल कर उपनिवेशवाद के रूप में ज्यादा वृहत् एवं सामूहिक स्तर पर होने लगा एक पूरा समाज एक दूसरे पूरे समाज का गुलाम हो गया।
आज के समय में हर आर्थिक शोषण का स्वरूप तकनीकी श्रेष्ठता (Superiority) के रूप में परिलक्षित है, जिसका उपयोग उपभोक्ता सामग्री से लेकर देश की सुरक्षा संबंधी उत्पादों द्वारा किया जा रहा है। देशों की सीमा के अन्दर या उसकी सीमा से परे भी यह तकनीकी शोषण जारी है एवं समयानुसार यह उग्रतर होता जाएगा। अतः हमें इस प्रकार के शोषण से मुक्त होना होगा क्योंकि वह प्रथम स्तर के गुलामी का ही दूसरा स्वरूप है।
उदाहरणार्थ,
एक MRI Machine (एक चिकित्सा उपकरण) या Su-30 सुरक्षा उपकरण का वास्तविक मूल्य यदि उत्पादक देश का Y मानव कार्य-दिवस है, तो उसका मूल्य हम या खरीदार देश 1000 Y मानव कार्य-दिवस के रूप में चुकाते हैं। अर्थात् उत्पादक देश के एक व्यक्ति के कार्य करने के बदले हमारे 1000 व्यक्तियों को काम करना पड़ता है। यह प्रथम स्तर की गुलामी से किस प्रकार भिन्न है? हम स्वयं ऐसी सारी चीजें उत्पन्न करके अपनी और अन्य लोगों की सेवा क्यों नहीं कर सकते?
इन सब मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अक्सर यह मूल प्रश्न उठ खड़ा होता है, कि हमें करना क्या है? या कि "तलाश" क्या करना चाहता है? निश्चित रूप से यह कोई 'दायी' संस्था नहीं है जो कंबल बाँटने, मुफ्त शिक्षा या चिकित्सा देने जैसा कोई कार्य करना चाहता है। इसकी यह स्पष्ट धारणा है कि यह मर्ज का समुचित इलाज नहीं है। कई बार ऐसा प्रयास बीमारी को बढ़ानेवाला सिद्ध होता है। हमें 'मिल जाता है' की मानसिकता से निकल कर 'मैं अर्जित कर सकता हूँ मुझे अर्जित करना ही पड़ेगा' की मानसिकता तक पहुँचने की आवश्यकता है। अतः यह सभी संबंधित लोगों में ऐसी मानसिक दृढ़ता और सोच पैदा करना चाहती है कि उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा और प्रगति/उपलब्धिः अस्तित्व रक्षा के लिए जो आवश्यक है वैसे सभी कार्य स्वार्थोन्मुख होते हुए भी सामूहिक हित के विपरीत नहीं हों। लोग यह सुनिश्चित करें कि जो उन्हें 'देय' है वह उन्हें अवश्य एवं पूरी तरह से मिले। इस सत्य को पुनः समझना होगा कि यह सिर्फ सेवाओं का उपभोक्ता या प्रजातंत्र का मालिक आम व्यक्ति ही कर सकता है, क्योंकि 'दायी' संस्थाएँ
गोलबंद होकर इसे नकारती हैं और इससे सम्पूर्ण समाज का पतन होता है।
इस प्रकार, तलाश का काम Nuclear Fission जैसा वैचारिक परिवर्तन है जिससे हमारे जीवन के सभी आयामों से संबंधित सारे कार्य ठीक दिशा में उन्मुख हो सकें। ऐसा होने से एक व्यक्ति अपने कार्य पर समयानुसार घर से निकलेगा, उसे जाने के लिए समयानुसार Public Transport मिलेगा, लोग लाइन में सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगे, गलत करनेवालों का अहिंसात्मक विरोध होगा, टूटी सड़कें, बहते पानी की सूचना संबंधित विभाग को समय पर मिलेगी एवं उस पर तुरत कार्रवाई होगी। अस्पताल, विद्यालय, प्रशासन, कार्य करने लगेंगे। खाली समय में लोग अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए अपनी आमदनी बढ़ाने का उपाय सोचेंगे उसे कार्य रूप में परिणत करेंगे। इतनी तेजी से यह प्रयास करना होगा कि जिससे हम आज के युग की तकनीकी गुलामी से अपने समाज को मुक्त कर सकें एवं अपना जीवन उच्चतर कर सकें ताकि जैविक नियमों के अनुसार हमारा उत्थान भी सामूहिक रूप से कल के अतिमानव (Super Human) के रूप में हो सके।
एक मूर्त्त कार्यक्रम के रूप में तलाश ने निम्नांकित संकल्प लिया है:-
1. हम गलत को गलत कहने का साहस करें।
2. अच्छे को अच्छा कहें।
3. हम अपनी आमदनी वाजिब तरीके से प्रतिदिन बढ़ाएँ।
4. रचनात्मक सामूहिक सोच का निर्माण करें।
5. ऐसे सभी कार्य अराजनैतिक एवं अहिंसात्मक हों।
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