आर्यावर्त्त के उत्कर्ष काल का राज प्रासाद। क्या भव्यता थी। कितनी सजावट, कितनी नक्काशी। मंत्रमुग्ध कर देने वाली।
राज सिंहासन, उच्च पदाधिकारियों के बैठने की व्यवस्था सहसा ही अच्छे-अच्छे अहंकारियों को उनकी लघुता का एहसास करा देने वाली। सामान्य सभासदों के बैठने की व्यवस्था भी कुछ इतनी अच्छी थी कि देवता भी उसका अनुभव करना चाहें और उनके बीच मनोरंजन के लिए बना मंडप तो अनुपम ही था।
इन सबों से भव्य एवं प्रभावशाली था सम्पूर्ण आर्यावर्त्त के एकछत्र सम्राट की उपस्थिति। देवतुल्य भीष्म का भारी व्यक्तित्त्व, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य एवं अन्य अतुलनीय व्यक्तियों की उपस्थिति।
किसे इच्छा नहीं होगी, ऐसे राज प्रासाद का एक हिस्सा बन जाने की! और यदि कोई प्रभावशाली पद मिल जाए तो अच्छे-अच्छे लोग अपने भाग्य पर इतराएँ। अगर यहाँ ज्ञानियों का विवेक कूच कर जाए तो आश्चर्य क्या? तथाकथित परम्पराओं के निर्वाह के तहत धर्मराज युधिष्ठिर यदि एक पूर्ण जुआरी हो जाएँ, भीम यदि विवश हो जाएँ, गलत अनुशासन का पाठ अर्जुन के गाण्डीव को मौन कर दे, नकुल सहदेव की तलवार म्यान से बाहर ही न निकल पाए तो फिर इन प्रश्नों पर कौन विचार करे:-
- कि धन की जगह व्यक्ति को कैसे दाँव पर लगाया जा सकता है? क्या व्यक्ति एक वस्तु मात्र है? अपने भाईयों को प्राणों से ज्यादा प्यार करनेवाले युधिष्ठिर ने उन्हें अपना गुलाम कैसे मान लिया? अपना धन कैसे मान लिया? और व्यक्ति की स्वतंत्रता?
- कि स्वयं को हारा हुआ व्यक्ति, जिसका स्वयं का कुछ रहा ही न हो, किसी दूसरे व्यक्ति को दाँव पर कैसे लगा सकता है?
- कि जूए के पासे से भारत की सबसे कुलश्रेष्ठ नारी, महारानी द्रौपदी सरेआम, सजे हुए भव्यतम राज प्रासाद में भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य की उपस्थिति में बाल पकड़कर घसीट लाई गई।
- कि रजस्वला, एकवस्त्रा एक नारी का (महारानी द्रौपदी को छोड़) सभा मंडप में चीर हरण हो? ऐसे इतिहास वाले इस भारतवर्ष में यदाकदा दलित महिलाओं को यदि गाँवों या मुहल्लों में लोग नंगे घुमाते हैं और प्रशासन और न्याय व्यवस्था यदि पंगु रह जाती है तो गलत कहाँ है?
सत्ता से जुड़े रहने और राजसुख का आनंद यदि भीष्म एवं कृपाचार्य की आँखें इस दृश्य को देखने के लिए खुली रह सकती है तो हमारे व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका के पदाधिकारियों का क्या दोष? 40% गरीबी रेखा के नीचे जीनेवाले लोगों के बीच लाख रुपया महीना एवं बिना काम के पचास हजार रुपए से ज्यादा पेंशन पानेवाले हमारे पदाधिकारियों का क्या दोष? और जब भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य (हमारे संवैधानिक प्रधान लोग) कुछ नहीं बोलते तो सामान्य सभासद (वकील, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक आदि) क्यों बोलें? इन्हीं कायरतापूर्ण कुतकों के तहत आज का बुद्धिजीवी वर्ग, साधन संपन्नवर्ग, अधिकार संपन्न वर्ग यदि राष्ट्रीय हितों को हर समय खुलेआम (राज सभा में सबों की उपस्थिति में रजस्वला, एक वस्त्रा द्रौपदी के चीर हरण की तरह) नीलाम कर रहे हों तो क्या आश्चर्य?
एकछत्र राजा बने रहने के लिए जुआ का सहारा लेने में, वाजिब हकदारों को 12 वर्षों का वनवास भेज देने में यदि आर्यावर्त्त के कर्णधारों को उस समय कोई परहेज नहीं था तो आज सत्ता सुख के लिए देश को जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, आतंक, नित नई विध्वंसक खोजों का उपयोग सत्ता पर काबिज होने या बने रहने के लिए करने में क्या दोष?
साधुवाद, कौरवों के उस एक भाई को जिसने गलत को गलत कहा, धिक्कार उन सबों को जिसने उसका साथ नहीं दिया। जरूरत थी सभासदों को आवाज बुलंद करने की, अपने जमीर को बाहर आ जाने देने की, सुविधाभोग और जड़ता को छोड़ देने की, भीष्म, द्रोण या कृपाचार्य किसी के भी पहल करने की, नारी का चीरहरण रुक सकता था। कई प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते। महाभारत में पांडव यदि सही थे, स्वयं कृष्ण उनके पक्षधर थे तो अंततः उनका भी नाश क्यों हुआ?
कृष्ण ने संपूर्ण आर्यावर्त के उन सबों का विनाश क्यों कर दिया/होने दिया जिनमें थोड़ा भी सत्त्व था। और इसके बावजूद वे योगेश्वर, अवतार, भगवान कैसे हो गए?
आज संतोष हो रहा है। जिस देश में, जिस सभा में द्रौपदी का चीर हरण हो, जिसे विभिन्न बहानों के तहत लोगों ने देखा और सहा वे सभी निश्चित रूप से विनाश के काबिल थे। जब किसी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का सामर्थ्य समाज के सामर्थ्य से बड़ा हो जाए, समाज उसके सामने गौण हो जाए तो ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों का नाश होना ही चाहिए। कृष्ण ने ठीक ही किया। चारों तरफ जंगल (राज) के कुछ हिस्से को खाक करके कृषि योग्य भूमि बना दी। सचमुच उनकी दृष्टि सम्यक थी। द्रौपदी (राष्ट्रहित) की पुकार को आज कोई नहीं सुन रहा। क्या राजनीतिज्ञ, क्या अधिकारी, क्या बुद्धिजीवी, क्या अधिकार संपन्न लोग, क्या सामान्य जन। क्या इतिहास दुहराया जा रहा है? पुनः महाभारत होगा? पता नहीं, परन्तु चीरहरण तो जारी है। यदि समय रहते गलत को गलत नहीं कहा गया, अच्छे को मान्यता नहीं मिली, एक पुरजोर सामूहिक आवाज नहीं उठी, तो पुनः विनाश अवश्यंभावी है।
उठें- महाभारत रोकें या फिर उसका प्रारंभ करें।
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