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भारतीय संविधान दुनिया के सबसे वृहत् संविधानों में से एक है। लेकिन समाज कैसे चलता है? इसके अपने रीति-रिवाज हैं। शादियों के नियम, सामाजिक व्यवहार के नियम, लिखे हुए हो सकते हैं परन्तु वे कानून नहीं हैं। सब कुछ कानून के दायरे में नहीं है। हर बात के लिए कानून बनाना संभव नहीं है फिर भी समाज चल रहा है और सुचारु रूप से चल रहा है। ऐसे बहुत से कबीले हैं, या सामाजिक इकाइयाँ हैं, जिनके अपने कानून हैं। ये देश के कानून से अलग भी हो सकते हैं परन्तु युगों से इन रिवाजों का पालन होता आ रहा है। ये अलिखित कानून लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी बहुत ही विस्तृत ढंग से Transmit होते आ रहे हैं। समयानुसार उसमें स्वतः परिवर्तन भी होते आ रहे हैं, लोगों को वह परिवर्तन स्वीकृत भी हो जाते हैं और अनुपालन भी होने लगता है।

कैसे?

परम्पराओं के प्रति व्यक्तिगत प्रतिबद्धता कैसे सुनिश्चित होती है?

समाज में आदर्श कैसे स्थापित हुए हैं?
नये आदर्श कैसे स्थापित होते हैं?
ये स्थापित आदर्श समाज को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का व्यवहार अनुकरणीय था, आदर्श था, कानून कभी नहीं बना। आज भी उदाहरणीय है क्यों?
इसमें अनुपालनार्थ कोई न्यायिक प्रक्रिया नहीं है, फिर भी इसका परिपालन कैसे सुनिश्चित है?
सामान्य लोकाचार के प्रति लोग कानूनी व्यवस्था से कहीं ज्यादा आश्वस्त होते हैं, क्यों?
कारण सिर्फ एक है:-
गलत को लोग गलत कहें, उसकी भर्त्सना करें।
"लोग भला क्या कहेंगे"? लोगों के कहने में अपार शक्ति है। 'लोगों का कहना' अत्यन्त मजबूत बंधन है, नियंत्रण है। हर कदम पर कामयाब है और हर जगह इसकी आवश्यकता है।

यह लोक-लाज, accpeted norms कानून से कहीं ज्यादा ताकतवर है जिसका लोग अनुसरण करते हैं।

यदि कार्यालय में कोई घूस ले रहा है और आप तीसरे व्यक्ति होकर टोक देते हैं, तो लड़ाई की नौबत आ जाती है।

गलत कर रहे अधिकारी को टोक दें, आपका काम खराब हो जाएगा।

चिकित्सक अस्पताल में देर से आते हैं, लोग नहीं टोकते हैं।
शिक्षक स्कूलों में नहीं आते हैं, यदि आप उनको सीधे कहेंगे तो पुनः झगड़े की नौबत आएगी।

यह भी प्रश्न होगा कि आप कौन होते हैं ऐसा कहने वाले, इत्यादि-इत्यादि।

गलत को गलत कहना साहस का कार्य है।
विरोध, लड़ाई और विभिन्न प्रकार की परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

तलाश के इस विषय के बारे में एक अत्यन्त वरीय, व्यक्ति का मानना था कि गलत को गलत कहना सही तो है परन्तु बहुत कठिन है। दवा तो है परन्तु बहुत कड़वी है।

हाँ, काफी हद तक यह सही है।
परन्तु अच्छे को अच्छा कहने में कोई आग नहीं उत्पन्न होती है। फिर भी यह बहुत प्रचलित नहीं है। क्यों कि यह भी साहस का कार्य है।

बेजारी/अनमनयस्कता/जड़ता से अलग-अच्छे को अच्छा कहना भी एक सक्रिय प्रक्रिया है। इसमें भी प्रयास लगता है।

फिर भी आसान है। अत्यन्त वांछनीय है।
उत्प्रेरक है।
दिशा निर्देशक है।
बीज मंत्र की तरह असरदार है।
जीवन में इस प्रकार के अणु प्रयास में कोई क्षति नहीं, कोई खर्च नहीं, फिर भी इसकी अत्यंत कमी है।

गलत को गलत एवं अच्छे को अच्छा कहना सड़क के दो किनारों की भाँति हैं। नदी के दो किनारों की तरह सामाजिक प्रवाह को सुनिश्चित एवं सुव्यवस्थित करती हैं। इन्हें हमें अपने दैनिक जीवन में, सामाजिक जीवन में, राष्ट्रीय जीवन में अपनाना ही चाहिए।

आप लोग

क्या कहूँ कि किस तरह सड़ गए हैं आप लोग,
सियासत के पचड़े में पड़ गए हैं आप लोग।
दलदल में हैं धँसे हुए, छींटों से खेलते हैं,
फिर भी दामन साफ है, कहते हैं आप लोग।
हमारे दिलों में कितनी गहराई, जज़्बातों की है,
नश्तर चुभा-चुभा के नापते हैं आप लोग।
सीमाएँ बेमानी हैं, मूल्यों के अर्थ बदल डाले,
शर्म-ओ-हया को बेचकर जीते हैं आप लोग।
अपनों से ही लड़-कट के बिखरता है आदमी,
मुहब्बत के नाम से ही खेलते हैं आप लोग।
जिनकी आँखें हैं खोजती सुबह की रौशनी,
उनकी लंबी रातों के नुमाइंदे हैं आप लोग।
वो जो रोज भीख चौराहे पे माँगता है,
लूटने में तो उसे भी, न बख्शे हैं आप लोग।

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