समस्याएँ कई हैं-
एक के बाद एक कतार में खड़ी हैं-
नयी नयी समस्याएँ उत्पन्न होती रहती हैं।
मैनपुरा सभा एवं तलाश द्वारा की गयी कई जनसभाओं एवं गोष्ठियों में यह उभरकर आया कि सबसे बड़ी समस्या, रंगदारी की है, छोटी-बड़ी स्थानीय, बृहत्तर...। लोगों ने यह समस्या रखी, हमारे पास हल नहीं (था)। रंगदारी व्यक्तिगत (छोटे समूह) द्वारा बहुत बड़े समूह का अलग-अलग दोहन है, प्रताड़ना है...
सभा में उपस्थित लोगों का विचार आया-
अभी उस समस्या को छोड़ें... गली की सफाई पर ध्यान दें यदि इसमें भी बाधा है तो स्कूल नहीं जा सकनेवाले बच्चों स्त्रियों को तो पढ़ाएँ।
"अपनी समस्याओं की पहचान, उनकी प्राथमिकता तय करना, अपनी समस्या एवं संसाधन की पहचान एवं उसके अनुरूप किसी एक छोटी बड़ी समस्या का निदान करें।" यह विचार आया।
रंगदारी पर बात करना मुश्किल था, सबों ने इस को दर किनार कर दिया। इसका हल असंभव मान लिया। एक व्यक्ति ने रोटरी क्लब की स्थापना के संबंध में बताया कि कैसे एक व्यक्ति के मन में विचार आया कि कुछ सामाजिक कार्य किया जाए। फिर समान विचार वाले चार दोस्त मिले, फिर प्लान बना। लोगों ने हँसी उड़ाई। फिर भी बारी-बारी से लोग मिले (इसलिए रोटरी) आज इतनी बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था बनी।
मिलना रंगदारी दूर नहीं कर सकता है। किसी समय जब जापान में अराजकता (रंगदारी) बहुत बढ़ गयी थी, चार (कुछ) युवकों ने मिलकर एक संस्था बनायी संस्था बढ़ी, संस्था का नारा बना-"पापी हमारे डर से थर-थर काँपें"। सामाजिक जीवन के पुनर्स्थापन में इसका सराहनीय स्थान रहा।
एक व्यक्ति ने अपने पिछड़े इलाके में एक महाविद्यालय बन जाने की कहानी बतायी कि कैसे कुछ दोस्तों ने गप्प में ये चिह्नित किया कि इलाके के पिछड़ेपन का कारण किसी महाविद्यालय का नहीं होना है, प्रतिभाशाली छात्र इसके बिना बर्बाद हो रहे हैं। इसे समाज का नहीं राज्य का कार्य कहते हुए कुछ ने असंभव के हद तक कठिन बताया। चर्चित होने से बात फैली, कुछ लोग आगे आए। सहमति मात्र से, सराहना मात्र से, कुछ लोगों ने चन्दा उगाहा, उनकी आलोचना हुई, उन पर तोहमत लगे... ज्यादा लोग शामिल हुए, प्रतिष्ठित लोग आगे आए महाविद्यालय बना आज उसमें बारह हजार विद्यार्थी पढ़ते हैं। इलाके से कई लोग इंजीनियर, डाक्टर, अधिकारी, नौकरीपेशा बने।
- मूल मंत्र "मिलें तो सही"
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