समय व्यक्ति, परिवेश से प्रभावित
अक्सर यहाँ न्याय रूप बदलता है।
कृति से प्रकृति करती नाइंसाफी,
सुविधा से समाज मूल्य तौलता है।
सामयिक कर्त्तव्य की नयी परिभाषा
को देख जब युग-धर्म बदलता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!
तटस्थ महारथियों समक्ष असहाय
अस्मिता का जब वस्त्र उतरता है।
वशीभूत आत्मकेन्द्रित विचार के
जब उदासीन समाज पनपता है।
पीढ़ियाँ स्व-परिधि में हों सीमित,
परिजनों का तब विश्वास डोलता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!
दधिचि, भगत होते हैं अप्रासंगिक,
उपेक्षित राष्ट्रीयता का त्याग होता है।
जल्दी में ज्यादा हथियाने की होड़ में,
आस-पास को रौंद स्वार्थ बढ़ता है।
महफूज, खुश हूँ, अपनी काबलियत पर,
कि दूसरों के लिए कब कौन मरता है
सोचो तो, क्या गलत होता है!
शब्दों से, गोष्ठियों से, भाषण से,
विद्वानों का सापेक्ष आदर्श टपकता है।
मेरा नहीं दूसरों का है यह दायित्व,
आम को समझा, जब नेतृत्व खिसकता है।
बदले हालात, न बदले सोच तो क्या,
अपना तो भावी व्यक्तित्व निखरता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है।
हर ओर से गूँजता आर्तनाद बेअसर,
पीड़ित हर स्वर बेबस, फाइलों में दबता है।
सोच का सच कर्म में दिखता नहीं,
सिर्फ चाहने से कब कहाँ अँधेरा छूटता है।
धर्म की हानि, दानवों का उत्थान निर्बाध,
कृष्ण या दुर्गा पर आश्रित, पौरुष रोता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!