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एच-3, डॉक्टर्स कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-20
समय व्यक्ति, परिवेश से प्रभावित
अक्सर यहाँ न्याय रूप बदलता है।
कृति से प्रकृति करती नाइंसाफी,
सुविधा से समाज मूल्य तौलता है।
सामयिक कर्त्तव्य की नयी परिभाषा
को देख जब युग-धर्म बदलता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!

तटस्थ महारथियों समक्ष असहाय
अस्मिता का जब वस्त्र उतरता है।
वशीभूत आत्मकेन्द्रित विचार के
जब उदासीन समाज पनपता है।
पीढ़ियाँ स्व-परिधि में हों सीमित,
परिजनों का तब विश्वास डोलता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!


दधिचि, भगत होते हैं अप्रासंगिक,
उपेक्षित राष्ट्रीयता का त्याग होता है।
जल्दी में ज्यादा हथियाने की होड़ में,
आस-पास को रौंद स्वार्थ बढ़ता है।
महफूज, खुश हूँ, अपनी काबलियत पर,
कि दूसरों के लिए कब कौन मरता है
सोचो तो, क्या गलत होता है!

शब्दों से, गोष्ठियों से, भाषण से,
विद्वानों का सापेक्ष आदर्श टपकता है।
मेरा नहीं दूसरों का है यह दायित्व,
आम को समझा, जब नेतृत्व खिसकता है।
बदले हालात, न बदले सोच तो क्या,
अपना तो भावी व्यक्तित्व निखरता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है।


हर ओर से गूँजता आर्तनाद बेअसर,
पीड़ित हर स्वर बेबस, फाइलों में दबता है।
सोच का सच कर्म में दिखता नहीं,
सिर्फ चाहने से कब कहाँ अँधेरा छूटता है।
धर्म की हानि, दानवों का उत्थान निर्बाध,
कृष्ण या दुर्गा पर आश्रित, पौरुष रोता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!
आँखें खुली पर राह दिखती नहीं,
धृतराष्ट्र का कैसे आदर्श चलता है।
कहाँ से कहाँ जाने का गम है सबको,
अपने कृत्य को कब कौन परखता है।
शारीरिक, नैतिक, सामाजिक दुर्दशा
पर हँसते, रोते सार्थक वक्त निकलता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!



बाहर घर से, कुठित मन से निकलो,
देखो, सुनो कैसा दर्द, हाहाकार होता है।
बढ़ो दरिया सा सबका सुख-दुख समेटकर,
मरुभूमि के किनारे कहीं बाग फलता है?
वाणी से, धन से, न सिर्फ किसी के चाहने से,
झुककर थामने से हताश को साथ मिलता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है!


सिर्फ स्वार्थ दृष्टि, हुनर हाथ में हो तो,
अपना ही घर कारागार बनता है।
उत्पन्न अन्दर प्रकाश, फैलाते बाहर तक,
हितैषियों का लोकहित में स्वर्ग होता है।
आसान नहीं उदास चेहरे पर मुस्कान लाना,
ऐसे मतवालों, हर पग सामर्थ्य परखता है।
सोचो तो, क्या गलत होता है।



गलत को गलत कहना कठिन हो गया,
अप्रिय अतीत से अपने, भय लगता है।
शुतुरमुर्ग सदृश सर छुपाना है हार,
संघर्षशील पहल से कारवां बढ़ता है।
कुछ तो करो कि जमाना फक्र से कहे,
कि एक व्यक्ति भी कुछ कर सकता है।
सोचो, तो क्या गलत होता है!


श्री राजीव रंजन वर्मा

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