इस तरफ हैं, उस तरफ हैं, हर तरफ हैं साक्षर।
आँखें फाड़े हूँ देखता किस तरफ हैं साक्षर ?
लूट जहाँ हो रही है साक्षर तो हैं वहीं,
जहाँ अनगिनत घूस-घोटाले पनप रहे, साक्षर क्या वहाँ नहीं?
कर चोरियाँ चलती जिधर हों उसी तरफ हैं साक्षर
आँखें फाड़े हूँ देखता किस तरफ हैं साक्षर ?
उजाड़ गरीबों को भगाता साक्षर उधर से आ रहा,
गरीब के घर आग लगा अपनी कुटिया को महल बना,
देखो! है साक्षर उधर से आ रहा।
छुप घात होती है जिधर उस तरफ हैं साक्षर
हैं साक्षर करोड़ों यहाँ, पर 95 प्रतिशत लुटेरे यहाँ।
खोज करता निरक्षर पर मिल रहे हैं साक्षर।
नेता उगते, वेता उगते, प्रशासन उगते, तकनीशियन उगते
पर उगते नहीं निरक्षर।
हे ईश करूँ वंदना तुझे, बना दे तू मुझे निरक्षर
आँखें फाड़ हूँ देखता किस तरफ हैं साक्षर ?
डॉ० अविनाश
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