गूंगे दे रहें हैं भाषण,
संगीत पर बहरे झूम रहे।
लंगड़े, देखो कत्थक करते,
तस्वीर को अंधे चूम रहे।
जिम्मेदारी देते बिल्ली को,
चूहों की रक्षा करने की।
साँपों को मिलती पूरी सुरक्षा,
पर है, उन्हें आजादी हँसने की।
बिल्ली बीच रोटी का झगड़ा,
मिलता, बंदर को सुलझाने को।
क्षीर-नीर अलग हो कैसे? हंसो,
को, चलते कौवे हैं समझाने को।
पदक अहिंसा का है मिलता,
मुँह खून लगे इन भेड़ियों को।
कह चालाकी को व्यवहार-कुशलता,
पूजा करते, आज धूर्त लोमड़ियों को।
आजकल अपने देश में लगभग
ऐसा ही तो होता है।
चाँद नहीं जगता है रात में,
और सूरज दिन भर सोता है।
प्रो० (डॉ०) अमरेन्द्र मिश्र
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