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गया में अस्थि रोग विशेषज्ञों का सम्मेलन था। आडंबरों में विश्वास न करने और आधुनिक शिक्षित होने के कारण पुरानी परंपराओं को गलत, बेबुनियाद एवं अनावश्यक मानने की सोच एवं इनके निर्वाह के प्रति एक अनिच्छापूर्ण मनःस्थिति के बीच पिण्डदान कर देने की सोचा। पुत्र भी साथ था। अतः उसी के जिम्मे इसकी जिम्मेवारी डाल दी। पहले फीस तय की गयी 250/-रुपये। पिण्डदान 51/- से लेकर कई हजार तक की फीस लेकर किया जा सकता था। हँसी आई। मुंडन की अनिच्छा को पंडित जी ने उसके सिर के एक दो गुच्छों को काट कर पूरा कर दिया। ढेर सारी तैयारियाँ। पीतल के बड़े-बड़े बर्तन, इत्यादि तुरंत उपस्थित हो गए। पिण्ड निर्माण की सामग्री से पिण्डों का निर्माण किया गया।

आलोचना के पूर्वाग्रह से ग्रस्त सब कुछ ढकोसला ही था। पंडितजी ने कहा, पहला पिंड मेरे पिताजी को फिर उनके पिताजी को फिर मेरे दादाजी के पिताजी को फिर दादा के दादा का नाम लेकर समर्पित करने को कहा, किया गया। फिर उन्होंने पाँचवीं पीढ़ी के दादा जी का नाम पूछा। मुझे मालूम न था। मेरी झेंप मिटाने के लिए पंडितजी ने 'यथानामे' कहकर उन्हें पिण्डदान करा दिया।

मेरी माताजी को पिंड दिया गया। फिर मेरे नानाजी को, फिर उनके पिताजी का नाम पूछा गया- पुनः मेरी झेंप ताड़कर 'यथानामे' पिंडदान हुआ।

मेरी माताजी के माता का नाम तो शुरू से ही मालूम न था-यथानामे। अपने वंश वृक्ष की इतनी कम जानकारी- पहली बार मुझे इसका ज्ञान हुआ।

फिर मेरे चाचाजी को पिंडदान देने को कहा गया। मैंने विरोध किया कि उनके लड़के उनका पिंडदान करेंगे। लेकिन पंडित जी ने समझाया- नहीं यजमान! आपके ही खानदान के हैं, उन्हें भी करना होगा।

गुरु परिवार को पिंडदान करने की बात हुई। उनके पिताजी को, माताजी को। किसी प्रकार धीरज रख कर यथानामे पिंडदान कर दिया गया। पंडितजी को जल्दी छोड़ने का अनुरोध (आदेश) किया। उन्होंने थोड़ा धीरज रखने को कहा और फिर पिंडदान हुआ उन पशुओं के नाम जिन्हें मेरे पूर्वजों ने पाला-पोसा था। यह ढकोसला मनोरंजक लगा।

फिर पालतू कुत्ते-बिल्लियों की बारी आयी। फिर पाले गए तोते और मैनों की। मैं उकता चुका था। सम्मेलन में जल्दी लौटना चाहता था। फालतू के ढकोसले को बंद करना चाहता था कि पंडितजी ने थोड़ा सब्र और करने को कहा। मैं सोच रहा था अब कौन बाकी है जिसे पिंडदान देना है। हद हो गई जब उन्होंने उन वृक्षों को पिंडदान करने को कहा जिसे मेरे पूर्वजों ने लगाया था और अब वे सूख गए थे।

मैंने कहा ये क्या बकवास है? पैसे की बात हो ही गई है लीजिए और समय बर्बाद मत करिए।

धैर्यवान पंडितजी ने कहा नहीं यजमान मैं आपका संकल्प बीच में नहीं छोड़ सकता। उन सूखे वृक्षों के नाम आपको पिंडदान करना ही होगा जिनके फलों को खाकर आपके पूर्वज और आप बड़े हुए उन्हें आपसे एक लोटा जल की आशा तो है ही।

अंधकार छंट जाने जैसी बात हुई। निरूत्तर हो गया। पंडितजी को घूर कर देखा। सहमति दी। समझ में आया मेरा वर्त्तमान जीवन क्या सिर्फ मेरे माता-पिता का ऋणी है? नहीं, उनके निर्माता मेरे पुरखों का, मेरे भाई, मेरे चाचा, मेरे अनेक शिक्षक, मेरे मित्र, अनजाने वे लोग जिन्होंने कई बार मेरी जिन्दगी बचाने जैसी मेरी मदद की। पूर्ण समाज जिसके बीच में जीता हूँ। फिर वे पशु-पक्षी जो हमारे जीवन को चलाते हैं। और वह पूरा वनस्पति जगत जो प्राणी मात्र का आधार है; मेरा भी है। मेरी उपस्थिति, मेरा जीवन सचमुच इन सबों पर आश्रित है और मुझे इनका ऋणी होना ही चाहिए। और ऋण चुकता करने के लिए लोगों को धन्यवाद, अन्य प्राणियों के प्रति सहृदयता और उनके बचाव के उपाय, वृक्ष रोपण और उन्हें एक लोटा जल देना ही चाहिए। इसी पर जीवन टिका है। यह पिंडदान नहीं कृतज्ञता ज्ञापन है। पूरे समाज से आपके जीवन के जुड़ाव का बोध करानेवाला है। पशु-पक्षी एवं वनस्पतियों के प्रति भारतीय दृष्टिकोण। उनके वैज्ञानिक संबंधों की विवेचना सहित स्वीकृति है और आने वाली पीढ़ियों को उनके प्रति अपनाए जाने के लिए 'दृष्टि' की शिक्षा है। कभी भी किसी भी पर्यावरणवादी ने मुझे इतनी अच्छी तरह से नहीं समझाया था।

पर्यावरण की अन्योन्याश्रिता को कितनी अच्छी तरह परंपरा में गूंथ दिया गया है। हम तथाकथित नवशिक्षित लोग क्या कभी अपनी शिक्षा का उपयोग अपने मूल को, अपनी परंपराओं के उद्देश्यों को समझने में करेंगे? क्या हमारे रीति-रिवाजों से जुड़ा सब कुछ बेकार और छोड़ देने लायक है, और कल का उत्पन्न, सतही उपज और मान्यताएँ अपनाने लायक हैं?

हमारा कर्त्तव्य है पंचतंत्र की शैली में अपने बच्चों को शिक्षित करना। पंडितजी को मेरा नमस्कार। आपने कितना कुछ बचाकर रखा है मेरे लिए सिर्फ 250/- रुपए लेकर।

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