हमारे देश की जनसंख्या आज करीब 120 करोड़ है। यदि हर व्यक्ति प्रतिदिन सिर्फ एक रुपया (वाजिब तरीके से) भी और कमाये तो प्रतिदिन इस देश में 120 करोड़ रुपये का कार्य होने लगेगा। यदि एक रुपया प्रतिदिन दस हाथों से गुजर जाए तो वह एक रुपया दस रुपया का काम कर डालेगा।
हमारे प्रदेश के ग्रामीण इलाके में शाम के बाद बिजली गुम हो जाती है। लोगों के पास निष्क्रिय हो जाने, सोने के अलावा कोई विकल्प शायद ही बचता है। अधिकतर युवक ताश खेलने लगते हैं- जो जुआ खेलने में परिवर्तित हो जाता है। अकेलेपन से जूझना शराब पीने में रूपान्तरित हो जाता है। दोस्तों के साथ कुछ करने, चोरियाँ करने अथवा अन्य प्रकार के छोटे-बड़े अपराध-कर्मों में परिवर्तित हो जाता है। इससे निर्माण के विपरीत निर्मित भी बिगड़ जाते हैं और यह हमारे मानव संसाधन का भयानक दुरुपयोग है। इसको यदि हम उपार्जन की ओर मोड़ सकें, खासकर ग्रामीण इलाकों में, तो देश निर्माण की प्रक्रिया तीव्र गति से हो सकेगी। कानून व्यवस्था या आतंकवाद की समस्या पर भी काबू पाया जा सकेगा।
क्या एक रुपया और लोगों की सृजनात्मक शक्ति को नहीं बढ़ाएगा?
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